गौतम बुद्ध को भगवान और महात्मा बुद्ध दोनों ही माना गया: जरावता

एनसीआर गुरुग्राम

फतह सिंह उजाला
गुरुग्राम । 
गौतम बुद्ध को भगवान और महात्मा बुद्ध दोनों ही रूप में माना और पूजा गया है । उन्होंने अर्जित अपने ज्ञान की बदौलत समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वास को प्रमाणिक तथ्यों और प्रयोग के आधार पर समाप्त करने में अतुलनीय योगदान दिया है । भगवान बुद्ध की शिक्षाएं आज भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए प्रासंगिक हैं । यह बात पटौदी के एमएलए एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मंत्री एडवोकेट सत्य प्रकाश जरावता के द्वारा कहीं गई । बुद्ध  पुर्णिमा के मौके पर एमएलए जरावता अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सरोज के साथ चंडीगढ़ में बुध विहार पहुंचे । यहां पहुंच कर उन्होंने सपत्नी भगवान बुद्ध  की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर श्रद्धा पूर्वक नमन किया । इस मौके पर उन्होंने सभी के स्वस्थ रहने, देश-प्रदेश की समृद्धि, खुशहाली और मजबूती की भी कामना की ।

एमएलए एडवोकेट सत्य प्रकाश जरावता ने बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर भगवान बुद्ध के दर्शन करने के उपरांत कहा की भगवान बुद्ध  के द्वारा कहा गया है कि दुखी होने से परेशानियां कभी भी समाप्त नहीं हो सकती। प्रत्येक इंसान को दुखों से छुटकारा पाने के लिए उसके कारण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। भगवान बुद्ध  के द्वारा कहा गया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी अवश्य दुखी होता है। प्रत्येक इंसान को यह जानना जरूरी है कि उसके दुखों का कारण और निवारण क्या और किस प्रकार है। हमारे अपने दुखों का मुख्य कारण तृष्णा ही है । जीवन में हमारे पास जो भी है, जितना भी है , यदि उसी में संतोष कर लिया जाए तो जीवन निश्चित ही सुखी और खुशहाल बनेगा ।

उन्होंने बताया कि महात्मा बुद्ध के जीवन में बूढ़े व्यक्ति, बीमार व्यक्ति , मृतक और प्रसन्न चित्त सन्यासी को देखकर बहुत बड़ा परिवर्तन आया । आज जिसे हम भगवान अथवा महात्मा बुद्ध  के रूप में जानते हैं, उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था । सिद्धार्थ ही गौतम बुद्ध बन,े गौतम बुद्ध  का जन्म कपिलवस्तु के पास लुंबिनी में हुआ था । उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के प्रधान थे और माता माया देवी कोरिया गणराज्य कोए वंश की कन्या थी । बालक सिद्धार्थ का जन्म होने के बाद कुछ ही दिनों उपरांत उनकी माता का निधन हो गया था , इन हालात में उनका पालन पोषण मौसी प्रजापति गोमती के द्वारा किया गया। बालक सिद्धार्थ का विवाह 16 वर्ष में ही शाक्य कुल की कन्या यशोदा के साथ कर दिया गया । उनके एक पुत्र भी हुआ, जिसका नाम राहुल था ।

विवाह के उपरांत गौतम बुद्ध के जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसके बाद में उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर दिया तथा इसके बाद में वह अनोवा नदी के तट पर अपना सिर मुंडवा कर भिक्षुओं के कषाय वस्त्र धारण कर 7 वर्ष तक यहां से वहां जंगलों में भटकते रहे । इसी प्रकार समय बीतने के साथ-साथ उन्होंने कठोर तपस्या की और 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात्रि में वट वृक्ष के नीचे नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ । इसी ज्ञान प्राप्ति के उपरांत बालक सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कहलाए और इसी नाम से प्रसिद्ध भी हुए । एमएलए एडवोकेट सत्य प्रकाश जरावता ने कहा यदि हम सभी को जीवन में सुखी और खुशहाल रहना है तो भगवान और महात्मा बुद्ध  के जीवन आदर्शों सहित उनकी शिक्षा को आत्मसात करना चाहिए । जितना अधिक हम आत्म संतोष करेंगे, उतना ही अधिक जीवन हम सभी का खुशहाल बनता चला जाएगा । यही महात्मा बुद्ध  के द्वारा दिए गए संदेश, उनके जीवन आदर्श और शिक्षा का सार भी है ।


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